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बंगाली कॉलोनी, अमृतसर में “कचरे से समुदाय का उत्थान: एक संघर्ष से सशक्तिकरण तक!”

क्या आपको अपने बचपन की वो घटना याद है, जब आप घर मे बिना बताए बाहर खेलने चले गए हो और वापस आने पर आपको डाँट पड़ी हो, ऐसा सिर्फ आपके साथ ही नहीं बल्कि तमाम युवाओ के साथ हुआ होगा, लेकिन क्या आप सोच सकते है किसी ऐसे युवा के बारे मे जो घर मे बिना बताए बाहर निकलता हो और उसका लक्ष्य हर उस उपेक्षित की मदद करना होता हो जिसे कही से मदद न मिल रही हो और घर लौटने पर वो बच्चा डाँट खाए की आज तुम फिर किसी की मदद करने चले गए। जीवन का ऐसा दौर जब उसके हमउम्र बच्चे भविष्य की योजना तैयार कर रहे होते थे की हमे भविष्य मे इंजीनियर बनना या डॉक्टर बनना है, लेकिन उस समय वो बच्चा जो अपने जीवन के विषमतम दौर से गुजर रहा हो जिसका रोज का पहला उद्देश्य यह हो की आज किसी तरह से भोजन का प्रबंध हो जाए ताकि उसके छोटे भाई-बहन भूखे न रह जाए,और इस विषमतम परिस्थिति मे भी वो हर वक्त किसी मजलूम और मजबूर की मदद को तैयार रहे यह सुन कर ही आश्चर्य होता है। तो आइए आपको मिलाते है देवी रानी जी से। देवी रानी ऐसी ही एक मिसाल हैं; यह वो बच्ची थी  जिसने न केवल अपने समुदाय के लोगों की मदद करने का फैसला किया बल्कि उन सभी लोगों की भी मदद की जो मदद मांगने के लिए उसके पास आए। देवी रानी आज 36 वर्ष की है और अमृतसर के बँगला कॉलोनी की प्रधान हैं। बँगला कॉलोनी जो की निवास स्थान है कूड़ा बीनने वालों और सफाई कर्मियों का जिन्हे आम तौर पर ‘सफाई साथी’ के रूप में जाना जाता है। देवी रानी जी के मन में बचपन से ही अपने साथियों और अपने समुदाय की मदद करने का जज्बा था। आज देवी रानी जी यूएनडीपी इंडिया और कोका कोला इंडिया फाउंडेशन (आनंदना) के सहयोग से चलाए जा रहे फिनिश सोसाइटी के प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन और आजीविका उत्पादन कार्यक्रम मे जुड़े छह स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की प्रमुख है। ‘कोमल स्वयं सहायता समूह’ जो की जैविक खाद और अपशिष्ट प्रबंधन पर काम करता है, कभी इन महिलाओ की आय का मुख्य स्रोत कूड़ा बीनना हुआ करता था और आज इस समूह और देवीरानी जी के प्रयास ने इन महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आया है। जिनकी आय का एकमात्र स्रोत कूड़ा बीनना हुआ करता था, आज, वे जैविक खाद तैयार करते हैं और अतिरिक्त आय के लिए इसे घर-घर बेचते हैं। एक अन्य स्वयं सहायता समूह ‘रंजू’ ने जैविक गुलाल तैयार करने और होली के दौरान इसे बेचने का अद्भुत काम किया। इन्होंने पुरुषों के लिए ‘लकी स्वयं सहायता समूह’ नामक एक समूह भी बनाया जो प्लास्टिक वेस्ट को छाँटने और प्रबंधन से संबंधित कार्य करते है। देवी रानी अपने स्वयं सहायता समूह ‘देवी रानी एसएचजी’ और अन्य समूह के बारे मे बताते हुए अपनी खुशी जाहीर करती है, जो उनके संरक्षण में अच्छा कार्य कर रहे हैं । देवी रानी जी ने बताया कि फिनिश सोसायटी के साथ मिलकर उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद करने के लिए कपड़े के थैले बनाए मार्केट मे बेचे और इन थैलों के बचे हुए कपड़े को मास्क बनाने के लिए का इस्तेमाल किया गया,  इतना ही नहीं आज यह दोनों समूह पेपर बैग और इको फ्रेंडली बैग बनाने के काम से भी जुड़े हैं।   देवी रानी जी कहती हैं, “हम पहले चाहे जो भी काम करे, हमे हमेशा ‘कचरा वाला/वाली’ या कूड़ा बीनने वाले के रूप में संबोधित किया जाता था, लेकिन अब लोग हमें एक अलग नज़रिये से देखते हैं। मैं वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रही हूं, लेकिन यूएनडीपी और फिनिश द्वारा प्रदान किए गए मंच ने हमें एक अलग स्तर की पहचान और सम्मान दिया है।” परियोजना के बारे में बात करते हुए वह कहती हैं कि, “शुरू में वह इसे अपनाने के लिए तैयार नहीं थीं, लेकिन फिनिश सोसाइटी के कार्यों और इनके कर्मचारियों से प्रेरित होने के बाद,  समूह की समस्त संगिनी सहमत हुईं और आज हम सब खुश हैं कि हमने यह निर्णय लिया।“ वह कहती हैं, “शुरुआत में मेरे पति और अन्य सभी इस परियोजना का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं था, क्योंकि उन्हे यह लगता था की आज से पहले भी बहुत से लोग आ चुके हैं और उनके द्वारा कुछ भी ऐसा नहीं किया गया है जो हमारे लिए अच्छा रहा हो, , लेकिन मैंने उन्हें यूएनडीपी की परियोजना और फिनिश सोसाइटी में विश्वास करने के लिए प्रेरित किया और मुझे खुशी है कि मैं सही थी क्योंकि मेरे सहकर्मी अब सशक्त महसूस कर रहे हैं।” हमारी परियोजनाओं के दौरान हमें अनेकों दृढ़ संकल्प और धैर्य की कहानियां मिलती हैं, जिन्हें हम दूसरों को प्रेरित करने के लिए एक उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत कर सकते हैं और देवी रानी की कहानी ऐसा ही एक उदाहरण है। देवी रानी,  का स्वप्न था की वो एक नर्स बने, क्योंकि वह हमेशा लोगों की सेवा करना चाहती थी लेकिन परिस्थितियों के कारण, वह बारहवीं कक्षा से आगे अपनी शिक्षा जारी नहीं रख सकी। जब वह मुश्किल से छह साल की थी तभी इनकी मां की मृत्यु हो गई और इनके पिता जो दशकों पहले पश्चिम बंगाल से अमृतसर आ गए थे, उन्हें पांच अन्य बच्चों की भी देखभाल करनी पड़ी। इनके पिता ने जीवनयापन के लिए कांच की मूर्तियाँ बनाना शुरू कर दिया। हालाँकि, बड़े परिवार को समभालने मे आने वाली आर्थिक समस्याओ की वजह से देवी रानी की शिक्षा को बीच मे ही रोकना पड़ा, लेकिन क्युकी देवीरानी जी पढ़ने मे तेज और होशियार थी इसलिए इनके दो शिक्षकों ने इनकी पढ़ाई का जिम्मा उठाया, देवी रानी ने 12 साल की उम्र में ही अपने साथ की अन्य लड़कियों के साथ कूड़ा बीनना शुरू कर दिया था, लेकिन इस स्थिति से ये संतुष्ट नहीं थीं, न सिर्फ स्वयं के जीवन मे अपितु अपने समुदाय मे वो कुछ बदलाव लाना चाहती थी  इसलिए उन्होंने अपनी शुरुआती किशोरावस्था में एक एनजीओ के साथ काम करना शुरू किया और शाम को गली के बच्चों को पढ़ाने लगी। साथ ही अपने समुदाय की बेहतरी के लिए जो कुछ भी कर सकती थी, करने की कोशिश की, इन्होंने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सक के दौरे के माध्यम से अपनी कॉलोनी के लोगों की भलाई के लिए प्रयास किया।   देवी रानी जी बारहवी कक्षा से आगे नहीं पढ़ सकी क्योंकि इनके पिता की बढ़ती उम्र और छोटे भाई बहनों की इनपर निर्भरता के कारण इनकी शादी 16 साल की उम्र में हो गई थी, लेकिन ये भाग्यशाली थी कि उसे एक ऐसा पति मिला जिसने देवी रानी जी को अच्छा काम करने के लिए प्रेरित किया। यहां तक कि इनकी शादी के तुरंत बाद एक साथी कार्यकर्ता की मदद करने को प्रोत्साहित किया जब की कोई भी उसकी मदद को आगे नहीं आ रहा था। वे कहती हैं, ”हमारे पड़ोस की एक साथी के साथ एक आदमी ने छेड़छाड़ की, लेकिन किसी ने उसका साथ नहीं दिया. हमने सभी को आगे आने के लिए और उसकी मदद करने को प्रेरित किया और हमने शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद अपराधी को गिरफ्तार कर लिया गया।” यही वह समय था जब देवी रानी जी ने “शिव नवजीवन सेवक सभा सोसाइटी” नामक अपना स्वयं का संगठन शुरू किया। परियोजना में शामिल होने से पहले,  उन्होंने जरूरतमंद लोगों के लिए अपनी कॉलोनी के पास एक मंदिर में ‘धर्मशाला’ बनाने में भी मदद की। देवी रानी की कहानी उनके दृढ़ संकल्प और यूएनडीपी और फिनिश सोसाइटी द्वारा न केवल महिलाओं और कूड़ा बीनने वालों को सशक्त बनाने बल्कि पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पैदा करने के लिए किए गए प्रयासों की बात करती है।

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